नई दिल्ली (RiNews): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत के वैश्विक नेतृत्व और उसकी प्राचीन सभ्यता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया है। दिल्ली में आयोजित एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि एक ‘विश्वगुरु’ के रूप में भारत का उदय दुनिया पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए होगा।
18वें बीएमएल मुंजाल पुरस्कार समारोह में मुख्य भाषण देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत का उत्थान हमेशा उसके सभ्यतागत और सांस्कृतिक मूल्यों (Civilisational Values) द्वारा निर्देशित होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब भारत मजबूत होता है, तो वह किसी अन्य देश का शोषण नहीं करता, बल्कि पूरी वसुधा को एक परिवार मानकर सबका कल्याण सुनिश्चित करता है।
नैतिक धन सृजन और श्रम की गरिमा पर जोर
अपने संबोधन में आरएसएस प्रमुख ने राष्ट्र निर्माण के चार मुख्य स्तंभों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के लिए ‘श्रम की गरिमा’ (Dignity of Labour), ‘समृद्धि का समान वितरण’, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ‘नैतिक धन सृजन’ (Ethical Wealth Creation) की आवश्यकता है। व्यापार और विकास में नैतिकता का होना उतना ही जरूरी है जितना कि आर्थिक लाभ कमाना।
“आरएसएस प्रमुख ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि देश के युवा केवल नौकरियों के पीछे भागने के बजाय नए विचारों और उद्यमिता के साथ राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं।”
RiNews विश्लेषण और प्रभाव: मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर युद्ध और अशांति का माहौल है। उनका यह संदेश न केवल भारत के आंतरिक आर्थिक दर्शन को रेखांकित करता है, बल्कि दुनिया को यह भरोसा भी दिलाता है कि भारत की बढ़ती सैन्य और आर्थिक ताकत वैश्विक संतुलन और शांति की गारंटी है।
स्रोतः आरआई न्यूज फीड नेटवर्क (एकीकृत) | संपादक मंडल: आरआई न्यूज डेस्क (RI News Desk)
📅 प्रकाशित तिथि: 16 Jun 2026 को 09:26 AM बजे | गाजीपुर, उत्तर प्रदेश



