
इजराइल-ईरान युद्ध के बीच भारत में फ्लाइट संकट, खाड़ी देशों से भारतीयों की वापसी और तेल सुरक्षा की तैयारी
पश्चिम एशिया में इजराइल-ईरान तनाव के बढ़ने के साथ ही इसका असर वैश्विक विमानन और ऊर्जा बाजार पर भी दिखने लगा है। संघर्ष के कारण कई देशों ने अपने हवाई क्षेत्र में प्रतिबंध लगाए, जिससे भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में उड़ान संचालन प्रभावित हुआ। भारत के कई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर 250 से अधिक फ्लाइट्स रद्द होने की खबर सामने आई है। इस स्थिति में भारत सरकार ने फंसे हुए भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी और ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है।
पश्चिम एशिया संकट का विमानन क्षेत्र पर असर
इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण खाड़ी क्षेत्र के कई एयरस्पेस अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर पड़ा। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे प्रमुख भारतीय एयरपोर्ट्स से संचालित 250 से अधिक अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स प्रभावित हुईं। कई एयरलाइनों ने सुरक्षा कारणों से अपने रूट बदल दिए या उड़ानें रद्द कर दीं।
एयर इंडिया, इंडिगो और अन्य एयरलाइनों ने पश्चिम एशिया के लिए अपनी कई सेवाएं अस्थायी रूप से रोक दीं। इससे हजारों यात्री एयरपोर्ट पर फंस गए। विमानन विशेषज्ञों के अनुसार यदि संघर्ष लंबा चलता है तो एयरलाइन कंपनियों की लागत बढ़ेगी और टिकट कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
स्पेशल फ्लाइट्स से भारतीयों की सुरक्षित वापसी
खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। संकट की स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने त्वरित कदम उठाए और विशेष उड़ानों की व्यवस्था की। एयर इंडिया, इंडिगो और अन्य एयरलाइनों के सहयोग से दुबई और अबूधाबी से विशेष फ्लाइट्स चलाई गईं।
इन उड़ानों के माध्यम से दो हजार से अधिक भारतीयों को सुरक्षित भारत लाया गया। विदेश मंत्रालय ने संकट प्रबंधन के लिए हेल्पलाइन और नियंत्रण कक्ष भी स्थापित किया है ताकि फंसे हुए नागरिकों को आवश्यक सहायता दी जा सके। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त चार्टर फ्लाइट्स चलाने की भी तैयारी की गई है।
कूटनीतिक स्तर पर भारत की सक्रियता
पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 48 घंटे के भीतर खाड़ी क्षेत्र के कई देशों के नेताओं से बातचीत कर स्थिति की जानकारी ली और क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की।
भारत के लिए यह संकट केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि आर्थिक और सामरिक महत्व का भी है, क्योंकि खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं। साथ ही भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
तेल आपूर्ति को लेकर भारत की रणनीति
इजराइल-ईरान संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है। सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत के पास लगभग 25 दिनों का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार मौजूद है। इसके अलावा पेट्रोल और डीजल के भी पर्याप्त भंडार उपलब्ध हैं, जिससे कुछ समय तक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी।
फिर भी संभावित संकट को देखते हुए भारत वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर काम कर रहा है। रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने पर चर्चा चल रही है, ताकि यदि पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होती है तो भी भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी हो सकें।
भारत के लिए संभावित प्रभाव
यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं।
पहला, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी आ सकती है जिससे भारत में ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। दूसरा, विमानन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय यात्रा महंगी हो सकती है। तीसरा, खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और रोजगार को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
हालांकि भारत सरकार ने अभी तक स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। नागरिकों की सुरक्षित वापसी, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना फिलहाल सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है।
विश्लेषण
पश्चिम एशिया में किसी भी सैन्य तनाव का असर हमेशा वैश्विक स्तर पर दिखाई देता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संकट केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी बन सकता है। भारत की रणनीति फिलहाल संतुलित कूटनीति, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और नागरिक सुरक्षा पर आधारित दिखाई देती है।
प्रभाव
आने वाले दिनों में यदि इजराइल-ईरान संघर्ष और बढ़ता है तो तेल कीमतों, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर बड़ा असर पड़ सकता है। भारत के लिए यह संकट ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी साबित हो सकता है।
— RI News Desk | 4 मार्च 2026
स्रोत:
Reuters
