मेगा राफेल डील: 114 फाइटर जेट्स की मंजूरी से भारत की वायु शक्ति में बड़ा उछाल

फॉर्मेशन में उड़ते राफेल फाइटर जेट्स, भारतीय वायुसेना की 114 राफेल डील से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर
114 राफेल फाइटर जेट्स की प्रस्तावित डील भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता और सीमा सुरक्षा को निर्णायक बढ़त देने वाली मानी जा रही है।

— National News Desk, RI News
13 फरवरी 2026 | 08:00 AM

मेगा राफेल डील: 114 फाइटर जेट्स की मंजूरी से भारत की वायु शक्ति में निर्णायक मोड़

13 फरवरी 2026 को भारत की रक्षा नीति में एक बड़ा और दूरगामी फैसला सामने आया, जब Defence Acquisition Council (DAC) ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की खरीद को Acceptance of Necessity (AoN) प्रदान की। यह मंजूरी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में दी गई, जिसे भारत की अब तक की सबसे महंगी रक्षा खरीद की दिशा में पहला औपचारिक कदम माना जा रहा है। कुल अनुमानित लागत ₹3.25 से ₹3.6 लाख करोड़ के बीच बताई जा रही है, जिससे यह सौदा केवल सैन्य नहीं बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी असाधारण बन जाता है।

यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब भारतीय वायुसेना गंभीर स्क्वाड्रन संकट से जूझ रही है। स्वीकृत 42 स्क्वाड्रनों के मुकाबले मौजूदा संख्या 29–30 तक सिमट चुकी है। MiG-21 जैसे पुराने विमानों की सेवानिवृत्ति और Jaguar तथा Mirage-2000 के अंतिम चरण में पहुंचने से यह कमी और गहरी हो रही है। दूसरी ओर, चीन अपने J-20 स्टेल्थ फाइटर और पाकिस्तान JF-17 Block-III के जरिए क्षेत्रीय वायु संतुलन को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में 114 राफेल जेट्स की यह योजना केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि वायु प्रभुत्व को दोबारा स्थापित करने की रणनीति है।

राफेल पहले ही भारतीय वायुसेना में अपनी क्षमता साबित कर चुका है। 2019 से ऑपरेशनल 36 राफेल जेट्स ने लंबी दूरी की स्ट्राइक, सटीक हथियार प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भारत को स्पष्ट बढ़त दी है। नई डील के तहत प्रस्तावित जेट्स से चीन सीमा (LAC) और पाकिस्तान सीमा (LoC) दोनों पर भारत की प्रतिक्रिया क्षमता कहीं अधिक मजबूत होगी। इसके साथ ही यह सौदा नौसेना के लिए भविष्य में कैरियर-आधारित फाइटर विकल्पों का रास्ता भी खोलता है।

इस डील का दूसरा बड़ा पहलू ‘Make in India’ है। प्रस्ताव के अनुसार अधिकांश जेट्स भारत में ही निर्मित किए जाएंगे, जिससे रक्षा उत्पादन में निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ेगी। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए रडार, एवियोनिक्स और हथियार प्रणालियों में आत्मनिर्भरता को बल मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इतनी बड़ी राशि कई वर्षों में चुकाई जाएगी, जिससे रक्षा बजट पर दीर्घकालिक दबाव बना रहेगा — यह इस सौदे की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह सौदा संवेदनशील है। 2016 की 36 राफेल डील पर उठे विवाद अभी भी सार्वजनिक स्मृति में हैं। सरकार इस बार Government-to-Government मॉडल को अधिक पारदर्शी बता रही है, लेकिन विपक्ष की निगाहें लागत, डिलीवरी टाइमलाइन और घरेलू उत्पादन की वास्तविक हिस्सेदारी पर टिकी रहेंगी। इसके बावजूद, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले इस मंजूरी को दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी के मजबूत संकेत के रूप में देखा जा रहा है, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में।

कुल मिलाकर, 114 राफेल जेट्स की यह मंजूरी भारत की रक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देती है। यह सौदा न केवल भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता को नई ऊंचाई देगा, बल्कि भारत के आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण और वैश्विक रणनीतिक संतुलन में उसकी भूमिका को भी पुनर्परिभाषित करेगा।

प्रमुख स्रोत:
Reuters – India Defence & Government Decisions
https://www.reuters.com/world/india/

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