
युद्ध की भाषा और मानवता का संकट
हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान चर्चा में है जिसमें उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सैनिकों को ईरानी जहाजों को डुबोने में “मज़ा” आ रहा है। यह कथन उस घटना के संदर्भ में आया, जिसमें IRIS Dena (Islamic Republic of Iran Ship Dena) सहित कई ईरानी जहाजों पर हिंद महासागर में कार्रवाई की बात कही गई। यदि किसी विश्व शक्ति के नेता की भाषा इतनी असंवेदनशील हो जाए कि युद्ध और विनाश भी मनोरंजन की तरह प्रतीत होने लगे, तो यह केवल एक देश की नहीं बल्कि पूरी मानवता की चिंता का विषय बन जाता है।
आज दुनिया के कई मुस्लिम देशों में आपसी संघर्ष, वर्चस्व की लड़ाई और राजनीतिक अस्थिरता दिखाई देती है। ईरान, यमन, सिरिया और इराक जैसे देशों में वर्षों से चल रहे संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। इन लड़ाइयों ने न केवल आर्थिक और सामाजिक ढांचे को कमजोर किया है, बल्कि मानवता को भी गहरी चोट पहुंचाई है। इनकी अस्थिरता का कारण भी उनकी स्वयं की अमानवीय कुकृत्य ही हैं।
जब किसी क्षेत्र में लगातार अमानवीय घटनाएँ होती हैं, तो प्रकृति उसे दण्डित करती है। आज उनकी करनी उनके सामने है। आज हालत यह है कि दुनिया के दूसरे देशों के लिए वहां खुलकर समर्थन देना भी कठिन हो रहा है। आज उसी अमानवीय कुकृत्यों की राह अमेरिका भी बढ़ रहा है। एक दिन इसका भी अहंकार टूटेगा।
संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से खुद को वैश्विक लोकतंत्र और मानवाधिकारों का रक्षक बताता रहा है, लेकिन ऐसी बयानबाज़ी उस छवि को गहरी चोट पहुंचाती है। युद्ध किसी खेल का मैदान नहीं होता, जहां जीत-हार पर आनंद लिया जाए। इसके पीछे सैनिकों की जान, परिवारों का दर्द और देशों के बीच स्थायी तनाव छिपा होता है। किसी जहाज को डुबोना केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि कई जिंदगियों के अंत की संभावना भी है।
दूसरी ओर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। इस क्षेत्रीय संघर्ष ने पहले ही मध्य-पूर्व को अस्थिर बना रखा है। ऐसे में यदि शक्तिशाली देशों के नेता अहंकार और आक्रामक भाषा का प्रयोग करेंगे, तो हालात और बदतर हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी महाशक्तियां शक्ति प्रदर्शन के नशे में डूबी हैं, तब दुनिया को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
यह भी सच है कि वैश्विक राजनीति में कई बार अलग-अलग पक्षों ने अमानवीय कृत्य किए हैं, जिसके कारण समुदायों और देशों के बीच अविश्वास गहराया है। परंतु किसी एक की गलती दूसरे को क्रूरता का अधिकार नहीं दे देती। यदि विश्व व्यवस्था को स्थिर रखना है, तो नेताओं को युद्ध की भाषा नहीं बल्कि संयम, कूटनीति और मानवता की भाषा बोलनी होगी। क्योंकि इतिहास अंततः ताकत से नहीं, बल्कि नैतिकता से निर्णय करता है।
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— Rajesh Rai “Pintu” | Guest Columnist
