
भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश में संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) का प्रतिशत बढ़कर 90.6 प्रतिशत पहुंच गया है। NFHS-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 88.6 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रगति भारत को सार्वभौमिक सुरक्षित प्रसव सेवाओं के लक्ष्य के और करीब ले जाती है।
संस्थागत प्रसव का अर्थ है कि बच्चे का जन्म किसी मान्यता प्राप्त अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र या प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की निगरानी में हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और चिकित्सा विशेषज्ञ लंबे समय से सुरक्षित प्रसव के लिए संस्थागत डिलीवरी को सबसे प्रभावी उपाय मानते रहे हैं क्योंकि इससे मातृ मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आती है।
क्या कहती है NFHS-6 रिपोर्ट?
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी NFHS-6 रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में देश में 90.6 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हुए। यह आंकड़ा दर्शाता है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और जागरूकता अभियानों का सकारात्मक प्रभाव देशभर में दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार ने गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों में प्रसव कराने के लिए प्रेरित किया है। एम्बुलेंस सेवाओं, आशा कार्यकर्ताओं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता ने भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकारी योजनाओं का योगदान
जननी सुरक्षा योजना (JSY), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। इन योजनाओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क जांच, परामर्श, प्रसव सेवाएं और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने और नियमित जांच कराने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे जोखिमपूर्ण गर्भधारण की पहचान समय रहते संभव हो पाती है।
मातृ और शिशु स्वास्थ्य पर प्रभाव
संस्थागत प्रसव बढ़ने का सबसे बड़ा लाभ मातृ और नवजात मृत्यु दर में कमी के रूप में देखा जाता है। अस्पतालों में प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों की मौजूदगी प्रसव के दौरान आने वाली जटिलताओं का तुरंत उपचार संभव बनाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार प्रसव के बाद मां और नवजात दोनों की निगरानी भी बेहतर तरीके से हो पाती है। इससे संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सकता है।
NFHS-6 रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि नवजात शिशुओं के टीकाकरण और स्तनपान से जुड़े कई स्वास्थ्य संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया गया है। यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है।
ग्रामीण भारत में बदलाव
कुछ दशक पहले तक ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में प्रसव घरों में होते थे। चिकित्सा सुविधाओं की कमी, जागरूकता का अभाव और आर्थिक चुनौतियां इसके प्रमुख कारण थे। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।
सड़क संपर्क, मोबाइल स्वास्थ्य सेवाएं, सरकारी अस्पतालों का विस्तार और स्वास्थ्य कर्मियों की सक्रिय भागीदारी ने ग्रामीण महिलाओं को संस्थागत प्रसव अपनाने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।
चुनौतियां अभी भी बाकी
हालांकि 90.6 प्रतिशत का आंकड़ा उल्लेखनीय उपलब्धि है, लेकिन अभी भी कुछ दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित बनी हुई है। कई क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की कमी चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि संस्थागत प्रसव को 100 प्रतिशत के करीब पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में और निवेश की आवश्यकता होगी। साथ ही मातृ पोषण, प्रसव पूर्व जांच और नवजात देखभाल पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
विश्लेषण
NFHS-6 का यह आंकड़ा भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की एक महत्वपूर्ण सफलता को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने और गरीब परिवारों को चिकित्सा सुरक्षा उपलब्ध कराने के प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया है।
हालांकि केवल संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में उपलब्ध सेवाओं की गुणवत्ता, प्रशिक्षित मानव संसाधन और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यदि वर्तमान प्रगति की गति बनी रहती है तो भारत आने वाले वर्षों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के कई वैश्विक लक्ष्यों को निर्धारित समय से पहले हासिल कर सकता है।
निष्कर्ष
NFHS-6 रिपोर्ट में संस्थागत प्रसव का 90.6 प्रतिशत तक पहुंचना भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उत्साहजनक संकेत है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि स्वास्थ्य सेवाएं अब पहले की तुलना में अधिक लोगों तक पहुंच रही हैं। मातृ और नवजात स्वास्थ्य की दृष्टि से यह आंकड़ा आने वाले वर्षों में और बेहतर स्वास्थ्य परिणामों की उम्मीद जगाता है।
स्रोत: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार; प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI)।
— RI News Desk
📅 Date: 30 May 2026
🕖 Time: 08:15 AM IST



