घूसखोर पंडत’ पर FIR, विरोध-प्रदर्शन, प्रचार सामग्री हटाई गई – क्या रिलीज रुकेगी? लखनऊ की सड़कों से दिल्ली कोर्ट तक

लखनऊ में 'घूसखोर पंडत' फिल्म टाइटल के खिलाफ ब्राह्मण समाज का प्रदर्शन, एफ़िजी जलाते हुए लोग और हाथों में विरोध प्लेकार्ड्स
लखनऊ की सड़कों पर गुस्से की आग – ‘घूसखोर पंडत’ टाइटल को अपमानजनक बताकर ब्राह्मण समाज ने एफ़िजी जलाया। प्लेकार्ड्स पर लिखा “फिल्म बैन करो”, “पंडितों का अपमान नहीं” – RiNews विशेष कवरेज

लखनऊ की सर्द हवाओं में इन दिनों एक नया विवाद गरम है। Netflix की अपकमिंग फिल्म ‘घूसखोर पंडत’  का टाइटल सुनते ही ब्राह्मण समाज और कई हिंदू संगठनों में आक्रोश फैल गया। फिल्म में मनोज बाजपेयी एक करप्ट पुलिस अफसर की भूमिका में हैं, जिसका निकनेम ‘घूसखोर पंडत’ है। लेकिन इसी नाम ने पूरे देश में बवाल मचा दिया है।

क्या है मामला? फिल्म का टीजर पिछले हफ्ते Netflix के 2026 स्लेट अनाउंसमेंट में रिलीज हुआ। जैसे ही लोग ‘घूसखोर पंडत’ पढ़े, सोशल मीडिया पर आग लग गई। ब्राह्मण समाज का कहना है कि ‘पंडत’ (पंडित) शब्द को ‘घूसखोर’ (रिश्वतखोर) से जोड़कर पूरी कम्युनिटी को बदनाम किया जा रहा है। ये सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी गरिमा पर हमला है।

लखनऊ के हजरतगंज थाने में FIR दर्ज हो चुकी है – CM योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर। आरोप: धार्मिक भावनाएं आहत करना, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना और जाति आधारित अपमान। दिल्ली हाई कोर्ट में PIL भी दाखिल है, जिसमें फिल्म की रिलीज पर स्टे की मांग की गई है।

सड़कों पर क्या हो रहा है? भोपाल, इंदौर, प्रयागराज, बुलंदशहर – कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। VHP और अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के लोग सड़कों पर उतरे, effigies जलाए गए। प्लेकार्ड्स पर लिखा – “नीरज पांडे मुर्दाबाद”, “मनोज बाजपेयी मुर्दाबाद”, “फिल्म बैन करो”। BSP सुप्रीमो मायावती ने भी बैन की मांग की, इसे जातिवादी बताया।

मेकर्स का क्या कहना है? निर्देशक नीरज पांडे ने स्पष्ट किया: “फिल्म पूरी तरह फिक्शनल है। ‘पंडत’ सिर्फ कैरेक्टर का लोकल निकनेम है, किसी कम्युनिटी को टारगेट नहीं किया। अगर किसी की भावनाएं आहत हुईं, तो माफी मांगते हैं।” उन्होंने टीजर और सारे प्रमोशनल मटेरियल सोशल मीडिया से हटा दिए। मनोज बाजपेयी ने भी कहा: “हम लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हैं। फिल्म किसी जाति के बारे में नहीं है।”

इंडस्ट्री की तरफ से भी तीर चले FWICE (फिल्म वर्कर्स फेडरेशन) के प्रेसिडेंट BN तिवारी ने सख्त लहजे में कहा: “ऐसे मेकर्स को फिल्म बनाने का हक नहीं। टाइटल बदलो, वरना कोई कोऑपरेशन नहीं।” कई सेलिब्रिटी और पॉलिटिशियन भी बोल चुके हैं – कुछ इसे क्रिएटिव फ्रीडम कह रहे, कुछ सेंसरशिप की मांग कर रहे।

लखनऊ से नजर: हमारी अपनी लखनऊ में ये मुद्दा घर-घर पहुंच रहा है। ब्राह्मण समाज के लोग कह रहे हैं – “हमारी पहचान से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं।” वहीं कुछ युवा इसे ओवर-रिएक्शन मानते हैं। लेकिन सवाल वही है: आर्ट की आजादी और भावनाओं का सम्मान – दोनों में बैलेंस कैसे बने?

फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई, लेकिन विवाद इतना बड़ा हो गया कि Netflix को सोचना पड़ रहा है। क्या टाइटल बदलेगा? क्या रिलीज डिले होगी? या कोर्ट फैसला सुना देगा? समय बताएगा।

यह विश्लेषण विभिन्न न्यूज़ रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया ट्रेंड्स पर आधारित है।

आप क्या सोचते हैं? कमेंट में बताएं – टाइटल बदलना चाहिए या फिल्म को रिलीज होने दें?

सरांश कुमार लखनऊ ८ फरवरी २०२६

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