
DRDO Hypersonic Test 2026: भारत ने हाइपरसोनिक युग में भरी ऐतिहासिक उड़ान
नई दिल्ली | 10 मई 2026
भारत ने रक्षा विज्ञान और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसने दुनिया की बड़ी शक्तियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हैदराबाद स्थित अपनी अत्याधुनिक प्रयोगशाला DRDL में एक्टिवली कूल्ड फुल स्केल स्क्रैमजेट कम्बस्टर का सफल लंबे समय तक का परीक्षण पूरा कर लिया है। इस परीक्षण की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इंजन ने लगातार 1,200 सेकंड यानी 20 मिनट से अधिक समय तक सफलतापूर्वक काम किया।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल एक इंजन टेस्ट नहीं, बल्कि भारत के हाइपरसोनिक भविष्य की औपचारिक शुरुआत है। इस सफलता के साथ भारत अब अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है जिसने इस स्तर की स्क्रैमजेट तकनीक को विकसित और सफलतापूर्वक परीक्षण किया है।
यह उपलब्धि ऐसे समय आई है जब दुनिया में हाइपरसोनिक हथियारों की होड़ तेज हो चुकी है और भविष्य के युद्धों को “स्पीड वॉरफेयर” का नाम दिया जा रहा है। ऐसे में भारत का इस क्लब में शामिल होना सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है स्क्रैमजेट इंजन और क्यों पूरी दुनिया इसके पीछे है?
स्क्रैमजेट (Supersonic Combustion Ramjet) एक अत्याधुनिक एयर-ब्रीदिंग इंजन है जो ध्वनि की गति से कई गुना अधिक तेज गति पर काम करता है। यह तकनीक मैक 5 से मैक 8 या उससे अधिक स्पीड तक पहुंच सकती है। आसान भाषा में कहें तो यह लगभग 6,000 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक की गति से उड़ान भरने में सक्षम होती है।
पारंपरिक रॉकेट इंजन अपने साथ ऑक्सीजन लेकर चलते हैं, लेकिन स्क्रैमजेट इंजन वातावरण से ही ऑक्सीजन ग्रहण करता है। यही कारण है कि यह हल्का, अधिक तेज और लंबी दूरी तक प्रभावी माना जाता है।
हालांकि इस तकनीक को विकसित करना बेहद कठिन माना जाता है। सुपरसोनिक स्पीड पर हवा का दबाव और तापमान इतना अधिक हो जाता है कि इंजन का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच सकता है। इतनी गर्मी में इंजन को स्थिर रखना, ईंधन का सही दहन बनाए रखना और संरचना को सुरक्षित रखना दुनिया की सबसे कठिन इंजीनियरिंग चुनौतियों में शामिल है।
DRDO ने इस समस्या का समाधान एक्टिव कूलिंग तकनीक से किया। इसमें स्वदेशी एंडोथर्मिक लिक्विड हाइड्रोकार्बन ईंधन का इस्तेमाल पहले कूलेंट के रूप में किया जाता है, जिससे इंजन का तापमान नियंत्रित रहता है और बाद में वही ईंधन दहन के लिए उपयोग होता है। यह तकनीक भारत की स्वदेशी इंजीनियरिंग क्षमता का बड़ा उदाहरण मानी जा रही है।
20 मिनट तक लगातार चला इंजन, क्यों है यह ऐतिहासिक?
यह परीक्षण 9 मई 2026 को हैदराबाद स्थित DRDL की Scramjet Connect Pipe Test Facility में किया गया। इस दौरान इंजन ने लगातार 1,200 सेकंड से अधिक समय तक स्थिर सुपरसोनिक दहन बनाए रखा।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपरसोनिक इंजन के लिए केवल कुछ सेकंड तक सफल परीक्षण कर लेना पर्याप्त नहीं होता। असली चुनौती लंबे समय तक स्थिर संचालन बनाए रखना होती है, क्योंकि वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में मिसाइल को लंबी दूरी तक यात्रा करनी पड़ती है।
यही कारण है कि DRDO का यह लॉन्ग ड्यूरेशन टेस्ट बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब प्रयोगशाला स्तर से आगे बढ़कर वास्तविक हाइपरसोनिक हथियार प्रणाली की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
इससे पहले जनवरी 2026 में 12 मिनट का सफल फुल स्केल परीक्षण और अप्रैल 2025 में सब-स्केल टेस्ट किया गया था। वर्तमान परीक्षण उन सभी उपलब्धियों से बड़ा माना जा रहा है।
भारत के हाइपरसोनिक कार्यक्रम की पूरी कहानी
भारत का हाइपरसोनिक कार्यक्रम अचानक शुरू नहीं हुआ। पिछले कई वर्षों से DRDO इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।
सबसे पहले HSTDV यानी Hypersonic Technology Demonstrator Vehicle कार्यक्रम शुरू किया गया। जून 2019 और सितंबर 2020 में भारत ने Mach 6 के आसपास सफल परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया था।
इसके बाद भारत ने कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए:
- HSTDV: हाइपरसोनिक तकनीक का डेमोन्स्ट्रेशन प्लेटफॉर्म
- ET-LDHCM: Extended Trajectory Long Duration Hypersonic Cruise Missile
- Project Vishnu: लंबी दूरी की अगली पीढ़ी की हाइपरसोनिक मिसाइल
रिपोर्ट्स के अनुसार ET-LDHCM प्रोजेक्ट का लक्ष्य Mach 8 से अधिक गति और 1,500 किलोमीटर से अधिक रेंज हासिल करना है।
यदि ये प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल होते हैं तो भारत के पास ऐसी मिसाइलें होंगी जिन्हें रोकना आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद कठिन हो जाएगा।
दुश्मन की एयर डिफेंस क्यों होगी बेअसर?
हाइपरसोनिक हथियारों को भविष्य का “गेम चेंजर” इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये केवल तेज नहीं होते, बल्कि अत्यधिक मैन्यूवरेबल भी होते हैं।
सामान्य बैलिस्टिक मिसाइलें तय रास्ते पर चलती हैं, इसलिए उन्हें ट्रैक किया जा सकता है। लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइलें उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती हैं। यही कारण है कि S-400, Patriot या Iron Dome जैसी उन्नत रक्षा प्रणालियों के लिए भी इन्हें रोकना कठिन माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में जिस देश के पास बेहतर हाइपरसोनिक तकनीक होगी, वही सामरिक बढ़त हासिल करेगा।
भारत की यह उपलब्धि चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए बड़ा संदेश मानी जा रही है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है, ऐसे में भारत का यह परीक्षण रणनीतिक संतुलन को मजबूत कर सकता है।

भारत दुनिया का चौथा देश कैसे बना?
अब तक केवल कुछ ही देशों ने हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट तकनीक में बड़ी सफलता हासिल की है।
- रूस: Avangard और Zircon जैसी मिसाइलें
- चीन: DF-17 Hypersonic Glide Vehicle
- अमेरिका: HAWC और ARRW कार्यक्रम
- भारत: अब लॉन्ग ड्यूरेशन फुल स्केल स्क्रैमजेट टेस्ट के साथ शामिल
उत्तर कोरिया ने भी हाइपरसोनिक परीक्षणों का दावा किया है, लेकिन विशेषज्ञ भारत की उपलब्धि को अधिक विश्वसनीय मानते हैं क्योंकि यह स्वदेशी रिसर्च, लंबे परीक्षण और वैज्ञानिक सत्यापन पर आधारित है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने क्या कहा?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO वैज्ञानिकों, उद्योग साझेदारों और शोध संस्थानों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल कार्यक्रम के लिए मजबूत आधार तैयार करेगी।
DRDO चेयरमैन समीर वी. कामत ने कहा कि यह सफलता आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में एक बड़ा कदम है और आने वाले समय में भारत रक्षा तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है।
आर्थिक और तकनीकी फायदे भी होंगे बड़े
इस सफलता का प्रभाव केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत को आर्थिक और तकनीकी स्तर पर भी कई बड़े लाभ मिल सकते हैं।
- रक्षा आयात पर निर्भरता कम होगी
- स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा
- रोजगार और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि होगी
- स्पेस टेक्नोलॉजी और एविएशन रिसर्च को नई दिशा मिलेगी
- भविष्य में रक्षा निर्यात बढ़ सकता है
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत यदि इस तकनीक को सफल हथियार प्रणाली में बदल देता है, तो वह वैश्विक रक्षा बाजार में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
क्या जल्द दिखेगी भारतीय हाइपरसोनिक मिसाइल?
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि DRDO का यह सफल परीक्षण आने वाले फ्लाइट टेस्ट की तैयारी का संकेत हो सकता है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता है तो अगले कुछ वर्षों में भारत अपनी स्वदेशी हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल का वास्तविक परीक्षण कर सकता है।
यह भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना — तीनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
विशेष रूप से हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति इससे काफी मजबूत हो सकती है।
निष्कर्ष
DRDO का यह सफल स्क्रैमजेट परीक्षण केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की उभरती हुई वैश्विक शक्ति का प्रतीक बन चुका है। भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और रक्षा विशेषज्ञों की वर्षों की मेहनत ने देश को हाइपरसोनिक युग में प्रवेश दिला दिया है।
आज दुनिया ऐसे हथियारों की ओर बढ़ रही है जिन्हें रोकना लगभग असंभव माना जाता है। ऐसे समय में भारत का इस तकनीक में सफल होना केवल रक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का भी बड़ा प्रतीक है।
आने वाले वर्षों में भारत की हाइपरसोनिक क्षमता वैश्विक सामरिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है और यही कारण है कि DRDO का यह परीक्षण इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा।




