वाशिंगटन/तेहरान। संयुक्त राज्य अमेरिका ने १४ अप्रैल २०२६ को ईरान के सभी बंदरगाहों पर नौसेना नाकाबंदी लागू कर दी है। यह कदम ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने और शांति समझौते के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों ने जलडमरूमध्य में स्थिति ले ली है। ईरानी तेल टैंकरों की आवाजाही पर सख्त निगरानी रखी जा रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान समझौता चाहता है लेकिन पहले होर्मुज को पूरी तरह खोलना होगा।
इस नाकाबंदी से पहले अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत हुई थी। दो सप्ताह के सीजफायर की घोषणा के बावजूद तनाव जारी रहा। ईरान ने चेतावनी दी है कि उसके हाथ ट्रिगर पर बने हुए हैं। नाकाबंदी के कारण वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड १०० डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया।
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व की लगभग २० प्रतिशत तेल आपूर्ति का मार्ग है। ईरान के खार्ग द्वीप से होने वाले अधिकांश तेल निर्यात इस रास्ते से गुजरते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नाकाबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक ईरान १० सूत्रीय शांति योजना को स्वीकार नहीं कर लेता।
ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस कदम को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का उल्लंघन बताया है। ईरान ने क्षेत्रीय देशों से समर्थन मांगा है। कुछ रिपोर्टों में ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड की ओर से जवाबी कार्रवाई की तैयारी की बात कही गई है।
विश्लेषण
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नाकाबंदी मध्य पूर्व में तनाव को और बढ़ा सकती है। होर्मुज का नियंत्रण ईरान की रणनीतिक ताकत रहा है। अमेरिका का यह कदम ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए है लेकिन इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकता है। चीन और भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ सकता है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता के बावजूद सीजफायर नाजुक बना हुआ है। इजराइल द्वारा लेबनान में जारी कार्रवाई भी इस समझौते को प्रभावित कर रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय शांति वार्ता की बहाली की अपील कर रहा है।
प्रभाव
इस नाकाबंदी से आम लोगों पर सबसे अधिक असर तेल की बढ़ती कीमतों के रूप में पड़ेगा। भारत जैसे विकासशील देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं जो परिवहन और उद्योग को प्रभावित करेगी।
ईरान में आम नागरिकों को पहले से ही आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। नाकाबंदी से निर्यात रुकने पर स्थानीय अर्थव्यवस्था और कमजोर होगी। वैश्विक स्तर पर एयरलाइंस को जेट ईंधन की बढ़ती लागत से नुकसान होगा।
भारत सरकार इस स्थिति पर नजर रखे हुए है और वैकल्पिक तेल स्रोतों की तलाश कर रही है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस तनाव से बचाव के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज किए जाएं ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
