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विकसित भारत @2047 का मुख्य आधार कृषि; पारंपरिक खेती में तकनीक और नवाचार का समावेश आवश्यक: लोकसभा स्पीकर

सौजन्य: संसद टीवी (Sansad TV) | अवधि: 15 मिनट 46 सेकंड

नई दिल्ली (RiNews): अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRNMS) द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में लोकसभा स्पीकर ने देश के कृषि कुलपतियों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को संबोधित किया। यह पहला अवसर है जब कृषि विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर, प्राध्यापक, वैज्ञानिक और शिक्षाविद एक मंच पर देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

संबोधन में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि यदि हमें 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करना है, तो उसका रोड मैप केवल और केवल कृषि आधारित (Agriculture-based) ही हो सकता है। कृषि हमारी खाद्य सुरक्षा को तो सुनिश्चित करती ही है, साथ ही यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और भारतीय सभ्यता का मूल उद्भव है।

भाषण के मुख्य बिंदु और वैचारिक मंथन

  • परंपरा और आधुनिकता का संगम: भारत का किसान स्वाभाविक रूप से पारंपरिक खेती की ओर प्रवृत्त है। लेकिन वर्तमान समय की मांग है कि लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अत्याधुनिक एग्रो-तकनीक का अधिकतम उपयोग किया जाए।
  • जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ: वैश्विक मंचों पर ‘क्लाइमेट चेंज’ एक गंभीर विषय है। बदलते मौसम चक्र को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों को ऐसी व्यावहारिक वैज्ञानिक रिसर्च करनी होगी जो कम पानी या विपरीत परिस्थितियों में भी फसलों की गुणवत्ता बनाए रख सके।
  • संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन: सिंचाई की पुरानी नहर प्रणालियों से आगे बढ़कर अब ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) और प्रभावी जल प्रबंधन को अपनाना होगा। इसके साथ ही प्राकृतिक खेती (Natural Farming) की ओर झुकाव और फर्टिलाइजर का संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है।
  • फूड प्रोसेसिंग और नए स्टार्टअप्स की सुस्ती: लोकसभा अध्यक्ष ने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में एग्रोटेक, फूड प्रोसेसिंग और नए स्टार्टअप्स में प्रगति तो हुई है, लेकिन हम अभी भी अपने वास्तविक लक्ष्य और अपेक्षाओं से काफी पीछे हैं। वैज्ञानिकों और शैक्षणिक महासंघ की यह जिम्मेदारी है कि वे इस गैप को भरें।

RiNews विश्लेषण: वैचारिक और व्यावहारिक धरातल

लोकसभा अध्यक्ष का यह वक्तव्य भारतीय कृषि जगत में एक बहुत बड़े विरोधाभास और उसके वैज्ञानिक समाधान की ओर संकेत करता है। व्यावहारिक धरातल पर भारतीय किसान ‘देखा-देखी’ की प्रवृत्ति (Herd Mentality) से ग्रसित रहता है—जैसे किसी एक सीजन में लहसुन या सोयाबीन का दाम बढ़ने पर पूरा क्षेत्र उसी की बुवाई कर देता है, जिससे उत्पादन अधिक होने पर अंततः बाजार मूल्य गिर जाता है।

दर्शन और विज्ञान का रूपांतरण: इस समस्या का एकमात्र समाधान यह है कि किसानों को केवल कल्पना या पारंपरिक धारणाओं के सहारे न छोड़कर उन्हें फसलों के ‘विविधीकरण’ (Diversification) के वैज्ञानिक और तार्किक विकल्प दिए जाएं। जब तक हम कृषि विज्ञान को ग्रामीण जीवन की व्यावहारिक दर्शन-भाषा में रूपांतरित नहीं करेंगे, तब तक कृषि में स्थाई आर्थिक परिवर्तन संभव नहीं है। वैज्ञानिकों की वास्तविक परीक्षा इस बात में है कि वे प्रयोगशाला के ज्ञान को खेत की मेढ़ तक कितनी सरलता से पहुंचा पाते हैं।

संबोधन का तात्कालिक एवं दूरगामी प्रभाव (Impact)

  1. नीतिक बदलाव को गति: इस सम्मेलन के निष्कर्षों से आईसीआर (ICAR) और देश के नीति-निर्माताओं को कृषि अनुसंधान के लिए एक नया विजन और रोड मैप तैयार करने में मदद मिलेगी।
  2. एग्रोटेक क्षेत्र में नए निवेश को प्रोत्साहन: लोकसभा अध्यक्ष द्वारा एग्रोटेक और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में लक्ष्य से पीछे रहने की बात रेखांकित करने से आने वाले समय में सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा कृषि-स्टार्टअप्स को विशेष वित्तीय और तकनीकी प्रोत्साहन दिए जाने की संभावना बढ़ेगी।
  3. अकादमिक जवाबदेही: देश के शीर्ष कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की उपस्थिति में दिए गए इस भाषण से अकादमिक अनुसंधान अब केवल डिग्री या शोध-पत्रों तक सीमित न रहकर सीधे ‘किसान की आमदनी दोगुनी करने और लागत घटाने’ की व्यावहारिक कसौटी पर परखा जाएगा।
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