नई दिल्ली / कोलकाता (RI News): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी शिकस्त के बाद, पार्टी के भीतर का असंतोष अब एक खुली बगावत में बदल चुका है। ‘द लल्लनटॉप’ के चर्चित शो ‘नेतानगरी’ (Netanagri) में वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा किए गए खुलासे के अनुसार, टीएमसी इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक पार्टी के शीर्ष चेहरों के इस्तीफे और बगावती सुरों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक्टिव सोर्स विश्लेषण: 19 सांसदों की बगावत और लोकसभा में अलग गुट की तैयारी
अंदरूनी सूत्रों और ‘नेतानगरी’ के राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, बगावत की आंच केवल कोलकाता तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की संसद तक पहुंच चुकी है। टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों ने दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला के कार्यालय से संपर्क कर सदन में ‘अलग बैठने की व्यवस्था’ (Separate Seating Arrangements) की मांग की है।
इस बागी गुट का दावा है कि वे ही ‘वास्तविक टीएमसी’ हैं और वे पार्टी के सिंबल पर भी अपना दावा ठोकने की तैयारी में हैं। इन बागी चेहरों में जादवपुर की सांसद सायनी घोष, पूर्व क्रिकेटर व बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान, काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं, जिन्होंने इस असंतोष पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
गहन विश्लेषण: कल्याण बनर्जी का अल्टीमेटम और ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी टूट और असंतोष के केंद्र में ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) का बढ़ता प्रभाव है। वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और रणनीतियों से नाराज चल रहा था, जो विधानसभा चुनाव में हार के बाद खुलकर सामने आ गया है। इसे अंदरूनी गलियारों में ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ का नाम दिया जा रहा है।
वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने सीधा और तीखा हमला बोलते हुए नेतृत्व को अल्टीमेटम दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वे पार्टी में तभी रहेंगे जब अभिषेक बनर्जी को सभी नेतृत्व पदों से हटाकर केवल एक सामान्य कार्यकर्ता बनाया जाए। इस बीच, राज्यसभा में भी टीएमसी को भारी झटके लगे हैं; वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय, सुस्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक जैसे सांसदों ने उच्च सदन और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से लगातार इस्तीफे दे दिए हैं।
इम्पैक्ट रिपोर्ट: राष्ट्रीय राजनीति और इंडिया (INDIA) ब्लॉक पर असर
इस बगावत का प्रभाव केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा असर भारतीय संसद के समीकरणों और विपक्षी एकता पर पड़ेगा:
RI News इम्पैक्ट असेसमेंट: लोकसभा में टीएमसी के पास कुल 28 सीटें थीं, जिनमें से 19 सांसदों के बागी होने के बाद ममता बनर्जी का संसदीय दल बेहद कमजोर हो जाएगा। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा में लगातार हो रहे इस्तीफों के कारण उच्च सदन में विपक्षी गठबंधन ‘INDIA ब्लॉक’ की ताकत घटेगी, जिससे एनडीए (NDA) को विधायी कार्यों में भारी बढ़त मिलने की संभावना है। बागी गुट के नेताओं की केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात की खबरों ने पश्चिम बंगाल में एक नए राजनीतिक ध्रुवीकरण के संकेत दे दिए हैं।
निष्कर्ष: ममता बनर्जी के लिए यह समय अग्निपरीक्षा जैसा है। विरोधी खेमा जहां इसे ’15 साल के कथित कुशासन और भ्रष्टाचार’ के खिलाफ जनता और जनप्रतियनिधियों का आक्रोश बता रहा है, वहीं ममता बनर्जी इसे पार्टी को अस्थिर करने की बाहरी साजिश करार दे रही हैं। बहरहाल, आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल की ‘दीदी’ अपने इस बिखरते कुनबे को कैसे संभालती हैं।


