दो गाँव, एक परंपरा: सुरों में सजी लौवाडिह की होली की साझी विरासत

लौवाडिह गाँव में पारंपरिक होली गीत गाते ग्रामीण, ढोलक और मंजीरे की संगत में सामूहिक गायन करते हुए, जहाँ सुरों के साथ होली की सांस्कृतिक परंपरा निभाई जाती है
गाज़ीपुर के लौवाडिह गाँव में होली के अवसर पर पारंपरिक गीतों के साथ सामूहिक गायन करते ग्रामीण, जो पीढ़ियों से चली आ रही लोक-सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखते हैं

— Awanish Kumar Rai | Bureau Chief, Ghazipur
दिनांक: 25 फरवरी 2026

गाज़ीपुर जनपद का लौवाडिह गाँव आज भी उस होली परंपरा को सहेजे हुए है, जिसमें रंगों से पहले सुर बोलते हैं। यहाँ होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, सामाजिक संवाद और सामूहिक चेतना का पर्व है। जब होली के गीतों में फिल्मी धुनें और तेज़ शोर हावी होते जा रहे हैं, ऐसे समय में लौवाडिह की होली एक शांत, सधे हुए और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में सामने आती है।

लौवाडिह में होली गायन की शुरुआत उन्हीं पारंपरिक पदों से होती है, जिनमें भक्ति, लोकजीवन और रस का संतुलन दिखाई देता है। “इसमें सगति साधु की, जहाँ मन पाये विश्राम” जैसी पंक्तियाँ होली गायन को केवल मौज-मस्ती तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे आत्मिक और सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान करती हैं। इसके साथ “खेलें अवध हमार सखी” और “श्याम संग खेलें होरी” जैसे पद लौवाडिह की होली को ब्रज और पूर्वी लोकपरंपरा से जोड़ते हैं।

इस परंपरा को जीवित रखने में गाँव के वरिष्ठ गायकों की भूमिका निर्णायक रही है। जनक देव राय और विजयशंकर पांडेय जैसे अनुभवी गायक वर्षों से होली गायन का नेतृत्व करते आ रहे हैं। उनकी अगुवाई में ढोलक और मंजीरे की संगत पर पूरा गाँव सुर में सुर मिलाता है। यह गायन किसी मंच या प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता का स्वाभाविक रूप है, जहाँ हर स्वर समाज का होता है, किसी एक व्यक्ति का नहीं।

संगीत की दृष्टि से लौवाडिह की होली शास्त्रीय रागों की कठोर सीमाओं में नहीं बँधी होती, लेकिन उसमें रागात्मक अनुशासन स्पष्ट दिखाई देता है। होरी अंग, देशज सुर और लोकताल का संतुलित प्रयोग इन गीतों को ऐसा प्रवाह देता है, जिसमें भाव प्रधान रहता है, प्रदर्शन नहीं। यही कारण है कि यहाँ की होली न तो अश्लीलता की ओर जाती है और न ही उच्छृंखल शोर में बदलती है, बल्कि संयमित उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा बनाए रखती है।

इस परंपरा का सामाजिक महत्व भी उतना ही गहरा है। होली गायन के दौरान जाति, वर्ग और आर्थिक भेद स्वतः गौण हो जाते हैं। चौपाल या सामूहिक स्थल पर बैठकर गाए जाने वाले ये गीत लौवाडिह को केवल एक गाँव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक समुदाय में बदल देते हैं। बुज़ुर्ग अपनी स्मृतियों के साथ गीतों को आगे बढ़ाते हैं, युवा उन्हें सीखते हैं और बच्चे उसी वातावरण में संस्कृति को आत्मसात करते हैं।

आज के समय में, जब लोकगीत या तो मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित हो गए हैं या बाज़ार के दबाव में अपना मूल स्वर खोते जा रहे हैं, लौवाडिह की यह होली परंपरा यह प्रमाणित करती है कि लोक-संस्कृति का वास्तविक संरक्षण समाज के भीतर ही संभव है। यहाँ गीत न तो किताबों से उतारे जाते हैं, न किसी बाहरी प्रभाव से गढ़े जाते हैं, बल्कि जीवन से निकलकर जीवन में ही लौट जाते हैं।


✍️ RI News संपादकीय

RI News मानता है कि लौवाडिह की होली परंपरा केवल एक स्थानीय सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण चेतना की जीवित अभिव्यक्ति है। “इसमें सगति साधु की, जहाँ मन पाये विश्राम” जैसी पंक्तियाँ यह याद दिलाती हैं कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की नैतिक और सांस्कृतिक स्मृति होते हैं। जनक देव राय और विजयशंकर पांडेय जैसे लोकगायक उन कड़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके माध्यम से परंपरा पीढ़ियों तक पहुँचती है। ऐसी परंपराओं को दर्ज करना केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top

RI NEWS INDIA

RI NEWS INDIA एक स्वतंत्र भारतीय डिजिटल हिंदी समाचार मंच है,
जो भारत और विश्व से जुड़ी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, व्यापार,
खेल, Tech–Science, शिक्षा एवं स्थानीय खबरें
विश्वसनीय स्रोतों के साथ प्रकाशित करता है।

उद्देश्य: सच तक, सबसे तेज़


Sections:
Home | राष्ट्रीय | अंतरराष्ट्रीय | Local News
व्यापार | Tech–Science | खेल | मनोरंजन

Info:
About Us | Editorial Policy | Contact Us


© 2025 RI NEWS INDIA (India) — All Rights Reserved