
इतिहास को अक्सर तथ्यों की सूची मान लिया जाता है— राजा, युद्ध, वर्ष और उत्तराधिकार। लेकिन यह मान्यता स्वयं में एक आधुनिक भ्रम है।
वास्तव में इतिहास का मूल प्रश्न यह नहीं होता कि क्या हुआ, बल्कि यह होता है कि किस पद्धति से हम यह तय करते हैं कि क्या हुआ था।
यही पद्धति (methodology) इतिहास को कभी विज्ञान बनाती है, और कभी विचारधारा का औज़ार।
भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि यहाँ इतिहास लिखने की परंपरा यूनानी या रोमन ढाँचे पर विकसित नहीं हुई।
यहाँ कालक्रम (timeline) से अधिक धारणा (concept) को महत्व दिया गया।
राजा कोई अकेला व्यक्ति नहीं था— वह एक सत्ता-सिद्धांत का प्रतिनिधि था। इसलिए उसका नाम, उसका वंश और उसका काल स्थिर नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक हो सकता था।
यही कारण है कि भारतीय परंपरा में एक ही नाम अलग-अलग कालखंडों में दिखाई देता है, और फिर भी उसे विरोधाभास नहीं माना गया।
आधुनिक इतिहासकार, जो इतिहास को केवल तिथियों की शृंखला मानता है, इस प्रतीकात्मकता को समझने में असफल रहा।
फलस्वरूप, भारतीय अतीत को एक ऐसे साँचे में ढाल दिया गया जो उसकी आत्मा के अनुकूल नहीं था।
यह पुस्तक यहीं से प्रश्न उठाती है—
यदि इतिहास की पद्धति ही भिन्न थी, तो क्या नामों और व्यक्तियों की हमारी व्याख्या पुनर्विचार की माँग नहीं करती?
यहीं से “चंद्रगुप्त मौर्य” एक व्यक्ति से आगे बढ़कर एक संभावित पद के रूप में विचारणीय हो जाता है।
