
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ग्रेट निकोबार द्वीप समूह का दौरा करने वाले हैं। ₹८१,००० करोड़ रुपये के विवादित ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर उन्होंने आदिवासी अधिकारों और पर्यावरणीय चिंताओं को उठाने का फैसला किया है।
विस्तृत विश्लेषण: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत सरकार का महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है जिसमें अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप और पर्यटन क्षेत्र विकसित करने की योजना है। यह प्रोजेक्ट अंडमान निकोबार द्वीप समूह को सिंगापुर और हांगकांग जैसा हब बनाने का सपना देखता है।
लेकिन स्थानीय शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों में भारी विरोध है। वे डरते हैं कि यह प्रोजेक्ट उनके पारंपरिक आवास, जंगलों और समुद्री संसाधनों को नष्ट कर देगा। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता का हॉटस्पॉट है। यहां दुर्लभ प्रजातियां, मैनग्रोव और प्राचीन जंगल हैं जो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं।
राहुल गांधी इस दौरे में जनजातीय समुदायों से मुलाकात करेंगे, स्थानीय नेताओं से बात करेंगे और प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभाव का जायजा लेंगे। उन्होंने पहले भी कहा था कि “विकास का नाम पर आदिवासियों को कुचलना गलत है”।
प्रभाव: यह दौरा पूरे देश में पर्यावरण बनाम विकास की बहस को फिर से गर्म कर देगा। अगर प्रोजेक्ट रुकता है तो सरकार की इंफ्रास्ट्रक्चर महत्वाकांक्षा प्रभावित होगी। वहीं यदि आगे बढ़ता है तो जनजातीय अधिकारों और पर्यावरण की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
यह मुद्दा २०२९ के चुनावों में भी राजनीतिक हथियार बन सकता है। अंडमान निकोबार में रहने वाले आदिवासी समुदायों का भविष्य और देश की जैव विविधता दोनों दांव पर हैं।
निष्कर्ष: विकास जरूरी है लेकिन पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की अनदेखी किए बिना। सरकार को जनजातीय लोगों की सहमति लेनी चाहिए, पर्यावरण प्रभाव आकलन को पारदर्शी बनाना चाहिए और सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल अपनाना चाहिए।
राहुल गांधी का यह दौरा एक याद दिलाता है कि विकास सिर्फ रोड-पोर्ट और एयरपोर्ट नहीं, बल्कि उन लोगों के हितों की रक्षा भी है जो सदियों से वहां रह रहे हैं।
हम सभी को इस मुद्दे पर सोचना चाहिए — क्या आर्थिक विकास की कीमत पर्यावरण और आदिवासी संस्कृति होनी चाहिए?
स्रोत: The Hindu, Indian Express & PTI (27 अप्रैल 2026) |
Rinews Desk | 27 अप्रैल 2026