बीज-स्मृति दर्शन: तत्व अनादि हैं — एक तार्किक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण

— H.N. Rai

25 मार्च 2026 | 09:00 AM

प्रस्तावना: मानव चिंतन के इतिहास में सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न सदैव केंद्रीय रहा है। क्या संसार का कोई प्रारंभ है? क्या सब कुछ किसी एक क्षण में उत्पन्न हुआ, या प्रकृति स्वयं ही शाश्वत है? “बीज-स्मृति दर्शन” का प्रथम सूत्र — “तत्व अनादि हैं” — इस प्रश्न का एक गहन, तार्किक और वैज्ञानिक उत्तर प्रस्तुत करता है। यह सूत्र न केवल पारंपरिक सृष्टि-धारणाओं को चुनौती देता है, बल्कि प्रकृति को एक निरंतर, आत्म-स्थित और संरचनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखने का दृष्टिकोण प्रदान करता है।

बीज स्मृति दर्शन के संदर्भ में ब्रह्मांड, प्रकृति और तत्वों की निरंतरता को दर्शाता दृश्य
प्रकृति और ब्रह्मांड के तत्व निरंतर परिवर्तनशील संरचनाओं में प्रकट होते हैं, पर स्वयं अनादि रहते हैं।

यह चित्र बीज स्मृति दर्शन के सिद्धांत को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाता है।

सूत्र 1: तत्व अनादि हैं

भाष्य

इस सूत्र का मूल कथन यह है कि प्रकृति के आधारभूत घटक — जिन्हें यहाँ तत्व कहा गया है — किसी समय विशेष में उत्पन्न नहीं हुए हैं। वे न तो किसी सृष्टि-क्षण के परिणाम हैं, न ही किसी बाहरी कारण के अधीन हैं, बल्कि वे स्वयं प्रकृति की मौलिक और शाश्वत वास्तविकता हैं।

हम अपने चारों ओर जो कुछ भी देखते हैं — पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, जीव-जंतु, मानव शरीर, यहाँ तक कि विचार और चेतना की संरचनाएँ — ये सभी परिवर्तनशील हैं। ये उत्पन्न होती हैं, विकसित होती हैं और अंततः नष्ट हो जाती हैं। किंतु इन सबके पीछे कुछ ऐसे आधारभूत घटक अवश्य हैं, जो स्वयं नष्ट नहीं होते, बल्कि निरंतर नए-नए संयोजनों में प्रकट होते रहते हैं। यही तत्व हैं।

यदि हम यह मान लें कि तत्व भी किसी समय उत्पन्न हुए, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उनके उत्पन्न होने के लिए कोई कारण रहा होगा। तब प्रश्न उठता है कि वह कारण क्या था? और उस कारण का कारण क्या था? इस प्रकार हम एक अनंत प्रतिगमन (Infinite Regress) की स्थिति में पहुँच जाते हैं, जहाँ प्रत्येक कारण के पीछे एक और कारण खड़ा हो जाता है। यह स्थिति न केवल दार्शनिक रूप से असंगत है, बल्कि ज्ञान की स्थिरता को भी असंभव बना देती है।

अतः इस समस्या से बचने का एकमात्र तार्किक समाधान यह है कि हम किसी स्तर पर जाकर एक ऐसी सत्ता को स्वीकार करें, जो स्वयं अकारण हो। “बीज-स्मृति दर्शन” इस अकारण सत्ता को किसी अलौकिक सत्ता में नहीं, बल्कि प्रकृति के मूल तत्वों में देखता है। इसलिए यह स्थापित किया जाता है कि तत्व अनादि हैं — अर्थात् उनका कोई प्रारंभ नहीं है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि अनादित्व का अर्थ स्थिरता या जड़ता नहीं है। तत्व निरंतर सक्रिय हैं, वे संयोजित होते हैं, टूटते हैं और पुनः संयोजित होते हैं। परिवर्तन केवल उनके रूपों, संरचनाओं और संयोजनों में होता है, न कि उनके अस्तित्व में।

उदाहरण के लिए, एक वृक्ष का जन्म, विकास और विनाश होता है, परंतु जिस पदार्थ और ऊर्जा से वह बना है, वे समाप्त नहीं होते। वे मिट्टी, वायु, जल और अन्य जीवों के माध्यम से पुनः किसी नई संरचना का भाग बन जाते हैं। इस प्रकार, संरचनाएँ नश्वर हैं, परंतु तत्व निरंतर बने रहते हैं।

आधुनिक विज्ञान भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करता है। भौतिकी का ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत कहता है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है, बल्कि केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इसी प्रकार, रसायन विज्ञान में पदार्थ का संरक्षण सिद्धांत यह बताता है कि पदार्थ भी नष्ट नहीं होता, बल्कि केवल रूप बदलता है।

यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करता है कि प्रकृति के मूल घटक किसी अंतिम उत्पत्ति या विनाश के अधीन नहीं हैं। वे केवल रूपांतरण की प्रक्रिया में रहते हैं।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह सूत्र सृष्टि के पारंपरिक “आरंभ” के विचार को चुनौती देता है। यदि हम मानते हैं कि संसार किसी एक क्षण में उत्पन्न हुआ, तो हमें उस उत्पत्ति के कारण को भी स्वीकार करना होगा। और यदि वह कारण स्वयं उत्पन्न हुआ है, तो पुनः वही समस्या खड़ी हो जाती है। इस प्रकार, “प्रथम कारण” की धारणा स्वयं एक तार्किक दुविधा बन जाती है।

“तत्व अनादि हैं” का सिद्धांत इस दुविधा को समाप्त करता है। यह बताता है कि प्रकृति स्वयं ही पर्याप्त है, उसे किसी बाहरी कारण की आवश्यकता नहीं है। यह एक स्व-स्थित (Self-sustained) तंत्र है, जो अपने भीतर ही निरंतर परिवर्तन और विकास करता रहता है।

इस सूत्र का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह संसार को एक स्थिर वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया (Process) के रूप में देखता है। यहाँ वास्तविकता किसी वस्तु में नहीं, बल्कि उसके निरंतर परिवर्तन में निहित है।

बीज-स्मृति दर्शन के संदर्भ में, “बीज” उस संरचनात्मक स्मृति का प्रतीक है, जो तत्वों के संयोजन में निहित रहती है। जब कोई संरचना नष्ट होती है, तब भी उसका बीज — अर्थात् उसकी संरचनात्मक संभावना — तत्वों में विद्यमान रहती है और उपयुक्त परिस्थितियों में पुनः प्रकट हो सकती है।

इस प्रकार, यह दर्शन न केवल भौतिक जगत को समझने का एक नया दृष्टिकोण देता है, बल्कि यह जीवन, चेतना और अस्तित्व की निरंतरता को भी एक वैज्ञानिक और तार्किक आधार प्रदान करता है।

उदाहरण

1. मिट्टी और घड़ा: घड़ा मिट्टी से बनता है और टूटकर पुनः मिट्टी में मिल जाता है। घड़े का अस्तित्व नश्वर है, पर मिट्टी बनी रहती है।

2. जल का रूपांतरण: जल बर्फ, भाप या द्रव के रूप में परिवर्तित हो सकता है, किंतु उसका मूल अस्तित्व समाप्त नहीं होता।

3. ब्रह्मांडीय चक्र: तारे जन्म लेते हैं, नष्ट होते हैं, और उनके तत्व नए तारों और ग्रहों के निर्माण में पुनः भाग लेते हैं।

निष्कर्ष

“तत्व अनादि हैं” का सूत्र यह स्थापित करता है कि संसार की विविधता और परिवर्तन का आधार किसी एक बार की सृष्टि नहीं, बल्कि अनादि तत्वों का निरंतर संयोजन है। यह दृष्टिकोण न केवल दार्शनिक रूप से सुसंगत है, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों के साथ भी सामंजस्य रखता है।

इस प्रकार, यह सूत्र हमें यह समझने में सहायता करता है कि वास्तविकता का मूल स्वरूप स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर प्रवाहित और परिवर्तनशील है — और इसी प्रवाह में ही अस्तित्व का सत्य निहित है।

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