
By Awanish Kumar Rai | Bureau Chief, Ghazipur
गाजीपुर की एक अदालत ने चार वर्षीय मासूम दानियाल खान की निर्मम हत्या के मामले में दोषी मामा अमजद खान को फांसी की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश शक्ति सिंह की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दोषी को तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। अदालत ने इस मामले को ‘दुर्लभतम से भी दुर्लभ’ श्रेणी का अपराध मानते हुए यह कठोर दंड सुनाया।
क्या है पूरा मामला?
यह सनसनीखेज घटना 21 अक्टूबर 2021 को गहमर कोतवाली क्षेत्र के बारा गांव में हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार पारिवारिक विवाद के बाद अमजद खान ने अपने ही चार वर्षीय भांजे दानियाल खान की चाकू से गर्दन रेतकर हत्या कर दी थी। घटना के समय बच्चे की मां शबाना नाज भी मौके पर मौजूद थीं।
घटना के बाद क्षेत्र में भारी आक्रोश फैल गया था। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ हत्या सहित संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था। मामले की जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया गया, जहां लंबे समय तक सुनवाई चली।
अदालत में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोषी से पूछा कि यदि उसे भविष्य में रिहा कर दिया जाए तो वह क्या करेगा। इस पर आरोपी ने कथित तौर पर कहा कि यदि कोई उससे उलझेगा तो वह उसकी हत्या कर देगा। अदालत ने इस बयान को गंभीरता से लिया।
जब उससे अपने कृत्य पर पछतावे के बारे में पूछा गया तो उसने किसी प्रकार का पश्चाताप व्यक्त नहीं किया। न्यायालय ने माना कि आरोपी के व्यवहार से उसके सुधार की संभावना अत्यंत कम दिखाई देती है।
अभियोजन पक्ष की दलील
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता अखिलेश सिंह ने अदालत को बताया कि आरोपी ने बच्चे पर अत्यंत निर्ममता से हमला किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि वार इतना गहरा था कि बच्चे के गले की अधिकांश नलियां कट गई थीं।
अभियोजन पक्ष ने इसे मानवता को झकझोर देने वाला अपराध बताते हुए कठोरतम दंड की मांग की थी।
फांसी की सजा क्यों सुनाई गई?
अदालत ने अपने निर्णय में माना कि पीड़ित एक चार वर्षीय मासूम बच्चा था, जो स्वयं की रक्षा करने में पूरी तरह असमर्थ था। आरोपी और पीड़ित के बीच मामा-भांजे का संबंध था, जिसमें संरक्षण और विश्वास का रिश्ता होता है।
न्यायालय के अनुसार आरोपी ने उसी विश्वास को तोड़ते हुए अत्यधिक क्रूरता के साथ हत्या की। इसके अलावा आरोपी द्वारा अदालत में व्यक्त किए गए विचारों और पछतावे के अभाव को भी न्यायालय ने महत्वपूर्ण माना।
सामाजिक प्रभाव
यह मामला केवल एक हत्या का नहीं बल्कि पारिवारिक विश्वास और सामाजिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करने वाला अपराध माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में त्वरित जांच और न्यायिक प्रक्रिया समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करती है।
मासूम बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर भी यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि न्यायालय ऐसे जघन्य अपराधों के प्रति सख्त रुख अपनाने को तैयार हैं।
विश्लेषण
भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी की सजा केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में दी जाती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत के तहत तभी मृत्युदंड दिया जाता है जब अपराध की क्रूरता, परिस्थितियां और समाज पर उसका प्रभाव असाधारण रूप से गंभीर हो।
गाजीपुर के इस मामले में अदालत ने पीड़ित की कम उम्र, आरोपी का निकट संबंधी होना, हत्या की बर्बरता और आरोपी के पश्चाताप के अभाव को ध्यान में रखते हुए इसे दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में माना।
निष्कर्ष
चार वर्षीय दानियाल खान हत्याकांड में आया यह फैसला गाजीपुर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। अदालत का मानना है कि ऐसे जघन्य अपराधों में कठोर दंड ही न्याय के उद्देश्य को पूरा कर सकता है। अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया उच्च न्यायालय की पुष्टि और संभावित अपीलों के माध्यम से आगे बढ़ेगी।
— Awanish Kumar Rai | Bureau Chief, Ghazipur



