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लोकसभा परिसीमन पर नई बहस: क्या 543 से बढ़कर 824 सीटें होंगी, और भारतीय राजनीति पर क्या पड़ेगा असर? - Uncategorized

By RI News Desk
Source: Times of India

देश में आगामी परिसीमन (Delimitation) को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक कार्यपत्र में सुझाव दिया गया है कि लोकसभा की 170 बड़ी सीटों को विभाजित कर कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 824 की जा सकती है। प्रस्तावित मॉडल में 59 सीटों का दो भागों में तथा 111 सीटों का तीन भागों में विभाजन करने की बात कही गई है। यह सुझाव ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार भविष्य के परिसीमन की तैयारी और राजनीतिक सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

परिसीमन का प्रस्ताव क्या है?

कार्यपत्र के अनुसार भारत की कई लोकसभा सीटों में मतदाताओं की संख्या अत्यधिक बढ़ चुकी है। कुछ सीटों में 30 लाख से अधिक मतदाता हैं, जिससे सांसदों और मतदाताओं के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो रहा है। इसी कारण बड़ी सीटों को विभाजित कर अधिक प्रतिनिधित्व देने का सुझाव दिया गया है। प्रस्ताव के अनुसार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक तीन-तरफा विभाजन हो सकते हैं, जबकि तमिलनाडु और केरल में बड़ी संख्या में दो-तरफा विभाजन प्रस्तावित हैं।

यह प्रस्ताव क्यों लाया गया?

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कई दशकों में देश की जनसंख्या, शहरीकरण और मतदाताओं की संख्या में भारी बदलाव आया है, जबकि लोकसभा सीटों की संख्या लगभग स्थिर बनी हुई है। कई महानगरीय क्षेत्रों में एक सांसद लाखों अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता प्रभावित होती है। EAC-PM का तर्क है कि छोटी और संतुलित सीटों से मतदाता भागीदारी बढ़ सकती है और सांसदों की जवाबदेही भी मजबूत होगी।

दक्षिण भारत की चिंताएं क्या हैं?

दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल लंबे समय से आशंका जता रहे हैं कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है। हालांकि प्रस्तावित अध्ययन में दावा किया गया है कि दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी लगभग समान बनी रहेगी। उदाहरण के लिए तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59, कर्नाटक की 28 से 42, आंध्र प्रदेश की 25 से 38, तेलंगाना की 17 से 26 तथा केरल की 20 से 30 तक पहुंच सकती हैं।

राजनीतिक प्रभाव क्या हो सकता है?

यदि भविष्य में इसी प्रकार का मॉडल लागू होता है तो भारतीय राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है। लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ने से राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों दोनों की रणनीति प्रभावित होगी। बड़े राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने के साथ-साथ महानगरों की राजनीतिक भूमिका भी मजबूत हो सकती है। इसके अलावा महिला आरक्षण और नए निर्वाचन क्षेत्रों के गठन जैसे मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकते हैं।

आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव

लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने का सीधा प्रभाव संसद भवन की कार्यप्रणाली, चुनावी खर्च, निर्वाचन आयोग की व्यवस्थाओं तथा प्रशासनिक संसाधनों पर पड़ेगा। नई सीटों के निर्माण के लिए व्यापक सीमा निर्धारण, बूथ पुनर्गठन और संसदीय संसाधनों का विस्तार करना होगा। हालांकि समर्थकों का तर्क है कि बेहतर प्रतिनिधित्व लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाएगा और जनता की आवाज संसद तक अधिक मजबूती से पहुंचेगी।

विश्लेषण

यह प्रस्ताव केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संरचना में संभावित बदलाव का संकेत भी है। पिछले कई दशकों में जनसंख्या और मतदाता संख्या में हुए बदलावों को देखते हुए परिसीमन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। लेकिन यह विषय केवल गणितीय नहीं बल्कि राजनीतिक और संघीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति आवश्यक होगी।

निष्कर्ष

लोकसभा परिसीमन पर चल रही चर्चा आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकती है। एक ओर बढ़ती जनसंख्या और विशाल निर्वाचन क्षेत्रों के कारण प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग है, वहीं दूसरी ओर राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी मौजूद है। यदि प्रस्तावित मॉडल पर आगे बढ़ा जाता है तो यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे बड़ा निर्वाचन सुधार साबित हो सकता है।

— RI News Desk

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