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कोच्चि (केरल): केरल के मट्टनचेरी में स्थित ‘जू टाउन’ (Jew Town) की तंग गलियों से गुजरते हुए इतिहास की एक अजीब सी खामोशी महसूस होती है। यहाँ की दो सौ से चार सौ साल पुरानी इमारतों की खिड़कियों पर आज भी ‘स्टार ऑफ डेविड’ (Star of David) के निशान हैं, हिब्रू भाषा के शिलालेख हैं और एक भव्य सिनैगॉग (यहूदी आराधनालय) है। लेकिन विडंबना यह है कि इस पूरे इलाके को यह पहचान देने वाले यहूदी परिवार अब यहाँ से पूरी तरह ओझल हो चुके हैं।
यह भारत के इतिहास का एक ऐसा अनूठा पन्ना है, जहां विरासतें तो अपनी जगह पर मजबूती से खड़ी हैं, लेकिन उन्हें बनाने वाले लोग हजारों किलोमीटर दूर जा चुके हैं। आखिर व्यापार और संस्कृति का केंद्र रही यह बस्ती अचानक इतिहास के पन्नों में कैसे सिमट गई? RiNews डेस्क ने इस ऐतिहासिक और सामाजिक बदलाव का गहराई से विश्लेषण किया है।
इतिहास और आगमन: दो लहरों में बसा समाज
कोच्चि में यहूदी समुदाय का आगमन एक दिन में नहीं हुआ। ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्थानीय श्रुतियों के अनुसार, इनके आने की दो मुख्य कड़ियाँ हैं:
मालाबारी यहूदी (काले यहूदी): इनका इतिहास ईसा मसीह के जन्म से भी लगभग एक हजार साल पहले का है। हजरत सुलेमान (Prophet Solomon) के काल में यहूदी व्यापारी मसाले की खोज में समुद्री मार्ग से प्राचीन बंदरगाह ‘मुज़िरिस’ (वर्तमान कोडुंगल्लूर) पहुंचे थे। वे यहीं रच-बस गए और स्थानीय मलयालम भाषा को अपनी मातृभाषा बना लिया।
परदेसी यहूदी (सफेद यहूदी): साल 1492 में जब स्पेन और पुर्तगाल में यहूदियों पर भयानक धार्मिक अत्याचार (Inquisition) शुरू हुआ, तब वहां से जान बचाकर भागे यहूदी तुर्की और बगदाद के रास्ते कोच्चि पहुंचे।
इन दोनों धाराओं के मिलन से ‘कोचिनी यहूदी’ समुदाय का निर्माण हुआ, जिन्होंने कोच्चि को वैश्विक व्यापार का एक बड़ा केंद्र बना दिया।
एक्टिव सोर्स: राजा का ताम्रपत्र और राजकीय संरक्षण
यहूदियों के फलने-फूलने के पीछे केरल के स्थानीय राजाओं की धार्मिक सहिष्णुता सबसे बड़ा कारण थी। जब पुर्तगालियों ने भारत में आकर यहूदियों को प्रताड़ित करना शुरू किया, तब कोच्चि के महाराजा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने अपने शाही महल और मंदिर के ठीक बगल की भूमि यहूदियों को सुरक्षित निवास के लिए दान कर दी।
ऐतिहासिक दस्तावेज (ताम्रपत्र): राजकीय रिकॉर्ड के अनुसार, कोच्चि के राजा ने यहूदियों को एक ‘कॉपर प्लेट’ (ताम्रपत्र) पर संप्रभुता और सुरक्षा का अधिकार लिख कर दिया था। इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि यह भूमि और अधिकार उनके पास तब तक रहेंगे “जब तक सूरज और चांद अपनी रोशनी बिखेरते रहेंगे।” इसी शाही संरक्षण के बाद इस इलाके का नाम ‘जू टाउन’ पड़ा।
आर्थिक प्रभाव: मसाले के कारोबार से वैश्विक रसूख तक
कोचिनी यहूदियों ने भारत के मसाला व्यापार, विशेषकर काली मिर्च (Black Pepper) के बाजार पर सदियों तक एकाधिकार रखा। हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों पर उनका इतना नियंत्रण था कि वे कोच्चि के राजा और विदेशी ताकतों के बीच मुख्य वार्ताकार की भूमिका निभाते थे। यहाँ तक कि मुगल दरबार में भी कोच्चि के राजा के प्रतिनिधि के रूप में यहूदी व्यापारियों को भेजा जाता था।
आज आर्थिक परिदृश्य बदल चुका है। पुराने मसालों के बड़े-बड़े गोदाम अब एंटीक (प्राचीन वस्तुओं) की दुकानों, आर्ट गैलरी और कैफे में तब्दील हो चुके हैं। वर्तमान में जू टाउन की लगभग 70 फीसदी दुकानों का संचालन मुस्लिम समुदाय के हाथों में है, जो मूल रूप से गुजरात के कच्छ या कश्मीर से आकर यहाँ बसे हैं।
स्थापत्य का विश्लेषण: समय से आगे का ‘क्लॉक टावर’
जू टाउन की स्थापत्य कला (Architecture) बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ का सबसे मुख्य आकर्षण ‘परदेसी सिनैगॉग’ के पास स्थित ऐतिहासिक क्लॉक टावर (घड़ीघर) है। 1760 के दशक में बना यह टावर लंदन के प्रसिद्ध ‘बिग बेन’ से भी लगभग 100 साल पुराना है।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका धर्मनिरपेक्ष और वैश्विक स्वरूप था। इसके चारों ओर अलग-अलग भाषाओं में समय दर्ज था:
हिब्रू भाषा: सिनैगॉग की तरफ वाले हिस्से पर।
मलयालम भाषा: राजा के महल की तरफ वाले हिस्से पर।
रोमन और अरबी अंक: समुद्र की तरफ वाले हिस्से पर, ताकि दूर से आने वाले विदेशी जहाजी और नाविक समय देखकर दिशा का अंदाजा लगा सकें।
पलायन का समाजशास्त्र: क्यों खाली हुआ जू टाउन?
आमतौर पर दुनिया के किसी भी हिस्से से यहूदियों के पलायन के पीछे उत्पीड़न, दंगे या नस्लीय हिंसा का क्रूर इतिहास रहा है, लेकिन भारत का इतिहास इस मामले में पूरी दुनिया से अलग और गौरवशाली है। कोच्चि या भारत के किसी अन्य हिस्से में यहूदियों को कभी भी प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़ा। वे यहाँ बेहद सम्मान और शांति के साथ रहे।
नेताओं और स्थानीय जानकारों के मुताबिक, उनके जाने के पीछे की वजह पूरी तरह से धार्मिक और सांस्कृतिक आकांक्षा थी। यहूदी धर्म में सदियों से यह मान्यता रही है कि एक दिन पूरा समुदाय अपनी पवित्र भूमि (Promised Land) यरूशलेम लौटेगा।
साल 1948 में जब ‘इजरायल’ (State of Israel) एक स्वतंत्र राष्ट्र बना, तो कोचिनी यहूदियों को लगा कि उनकी सदियों पुरानी मन्नत पूरी होने का समय आ गया है। अपनी आस्था के कारण, उन्होंने धीरे-धीरे इजरायल की ओर हिजरत (पलायन) करना शुरू कर दिया। कुछ परिवार बेहतर आर्थिक भविष्य के लिए अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी चले गए।
इम्पैक्ट: पीछे छूट गई सिर्फ यादें
आज मट्टनचेरी में जब शाम ढलती है, तो जू टाउन की दीवारें सैलानियों से गुलजार तो होती हैं, लेकिन वे मूल लोग गायब हैं जिनकी यह संस्कृति थी। यहूदी समुदाय भले ही आज इजरायल में बस गया हो, लेकिन उनकी जीवनशैली में आज भी केरल की झलक मिलती है—वे आज भी वहां अपने घरों में मलयालम बोलते हैं और ओणम जैसे त्योहारों की यादें साझा करते हैं।
जू टाउन आज एक ऐसा जीवंत संग्रहालय बन चुका है जो दुनिया को संदेश देता है कि भारत ने हमेशा हर संस्कृति को गले लगाया, उन्हें फलने-फूलने का अवसर दिया और जब वे अपनी आस्था के लिए गए, तो पीछे एक अमिट सांस्कृतिक विरासत छोड़ गए।
स्रोत: Zee News



