
नई दिल्ली | RI News Desk
साल 2047 तक भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य के तहत न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। संसद में ‘शांति’ विधेयक पारित कर दिया गया है, जिसके तहत भारत की न्यूक्लियर ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
न्यूक्लियर एनर्जी क्या है?
न्यूक्लियर एनर्जी वह ऊर्जा है जो परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) की प्रक्रिया से उत्पन्न होती है। इसमें यूरेनियम या प्लूटोनियम जैसे तत्वों के परमाणु टूटते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊष्मा निकलती है। इसी ऊष्मा से भाप बनती है और टर्बाइन घूमकर बिजली पैदा होती है।
न्यूक्लियर ऊर्जा की खास बात यह है कि इससे कार्बन उत्सर्जन बेहद कम होता है, जिसके कारण इसे स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
भारत न्यूक्लियर एनर्जी में पीछे क्यों है?
भारत में न्यूक्लियर ऊर्जा की हिस्सेदारी कुल बिजली उत्पादन में अभी भी 5 प्रतिशत से कम है। इसके पीछे कई कारण रहे हैं —
- परमाणु संयंत्रों की ऊंची लागत और लंबी निर्माण प्रक्रिया
- अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौतों और तकनीकी प्रतिबंधों का इतिहास
- सुरक्षा और रेडिएशन को लेकर जन-सुरक्षा की चिंताएं
- निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी
‘शांति’ विधेयक में क्या है खास?
सरकार के अनुसार ‘शांति’ विधेयक का उद्देश्य न्यूक्लियर सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देना, तकनीकी विकास को तेज करना और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
विधेयक के जरिए सरकार न्यूक्लियर ऊर्जा को कोयला आधारित बिजली का विकल्प बनाना चाहती है, ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिल सके।
विपक्ष ने क्यों उठाए सवाल?
विपक्षी दलों ने इस विधेयक पर सुरक्षा, पारदर्शिता और न्यूक्लियर कचरे के निपटान को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बिना ठोस सुरक्षा ढांचे और स्थानीय सहमति के बड़े न्यूक्लियर प्रोजेक्ट जोखिम भरे हो सकते हैं।
आगे क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘शांति’ विधेयक को ठोस नीति और सुरक्षा मानकों के साथ लागू किया गया, तो भारत 2047 तक स्वच्छ और स्थायी ऊर्जा के लक्ष्य के काफी करीब पहुंच सकता है।
हालांकि, इसके लिए तकनीकी क्षमता, मानव संसाधन और जनविश्वास — तीनों पर एकसाथ काम करना जरूरी होगा।
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