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कूनो नेशनल पार्क में दुर्लभ ‘कराकल’ बिल्ली की वापसी: ‘प्रोजेक्ट चीता’ से सुधर रहा है कूनो का इकोसिस्टम

श्योपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बेहद उत्साहजनक और ऐतिहासिक सफलता सामने आई है। पार्क में हाल ही में किए गए एक विस्तृत कैमरा ट्रैप सर्वे के दौरान भारत की सबसे दुर्लभ जंगली बिल्लियों में से एक, ‘कराकल’ (Caracal) को देखा गया है। कई दशकों के बाद कूनो के जंगलों में इस अत्यधिक संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति की उपस्थिति दर्ज होना इस बात का सीधा संकेत है कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ के आने के बाद से यहाँ के मैदानी पारिस्थितिकी तंत्र (Grassland Ecosystem) में सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस खोज की पुष्टि करते हुए इसे राज्य के वन्यजीव प्रबंधन और कूनो के इकोसिस्टम के पुनरुद्धार की एक बड़ी उपलब्धि बताया है।

लंबे काले कानों वाली दुर्लभ कराकल जंगली बिल्ली का क्लोज-अप शॉट
विलुप्ति की कगार पर खड़ी कराकल बिल्ली (फाइल फोटो)

कराकल: क्यों महत्वपूर्ण है इसकी वापसी?

कराकल, जिसे हिंदी में ‘स्याहगोश’ भी कहा जाता है, अपने कानों के ऊपर मौजूद काले बालों के गुच्छों और बेजोड़ चपलता के लिए जानी जाती है। भारत में यह प्रजाति मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों तक ही सीमित मानी जा रही थी, और मध्य प्रदेश से इसके विलुप्त होने की आशंका जताई जा रही थी।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, कराकल का कूनो में दिखाई देना यह साबित करता है कि पार्क का जमीनी तंत्र अब इस छोटे शिकारी जीव के रहने, छिपने और शिकार (जैसे छोटे कृंतक और पक्षी) के लिए पूरी तरह अनुकूल हो चुका है।

‘प्रोजेक्ट चीता’ का अप्रत्यक्ष प्रभाव: कैसे बदला कूनो का मिजाज?

सितंबर 2022 में कूनो नेशनल पार्क में अफ्रीका से लाए गए चीतों को बसाने के लिए ‘प्रोजेक्ट चीता’ की शुरुआत की गई थी। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य केवल चीतों को बचाना नहीं, बल्कि भारत के लुप्त हो रहे घास के मैदानों (Grasslands) को पुनर्जीवित करना भी था।

विगत साढ़े तीन वर्षों में प्रोजेक्ट चीता के कारण कूनो में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जिसने कराकल जैसी अन्य दुर्लभ प्रजातियों के लिए भी अनुकूल माहौल तैयार किया है:

  • शिकार के आधार (Prey Base) में सुधार: चीतों के लिए पार्क के भीतर चीतल, सांप और चौसिंगा जैसे शाकाहारी जीवों के संरक्षण और उनकी संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया। इस वजह से कूनो में छोटे और बड़े दोनों तरह के शिकारियों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ी है।
  • सुरक्षा व्यवस्था में भारी बढ़ोतरी: चीतों की सुरक्षा के लिए पूरे कूनो नेशनल पार्क में गश्त (patrolling) बढ़ा दी गई है, अवैध कटाई और शिकार पर पूरी तरह से रोक लगी है, और ड्रोन व आधुनिक कैमरा ट्रैप्स का जाल बिछाया गया है। इसी उन्नत निगरानी तंत्र की वजह से कराकल की मौजूदगी कैमरे में कैद हो सकी।
  • घास के मैदानों का प्रबंधन: चीतों की प्राकृतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कूनो के जंगलों और खुले मैदानों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया गया है। यह शुष्क और झाड़ीदार परिवेश कराकल बिल्ली का भी पसंदीदा निवास स्थान (Habitat) है।

कूनो नेशनल पार्क के मैदानी और शुष्क घास के मैदानों का प्राकृतिक दृश्य
कूनो नेशनल पार्क का ग्रासलैंड इकोसिस्टम

पत्रकारिता दृष्टिकोण और निष्पक्ष विश्लेषण

जहाँ एक ओर कूनो में कराकल की साइटिंग वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ा उत्सव है, वहीं स्वतंत्र वन्यजीव विश्लेषक इसे एक व्यापक दृष्टिकोण से देखते हैं। कूनो प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि यह खोज इस बात की पुष्टि करती है कि किसी एक ‘अम्ब्रेला स्पीशीज’ (जैसे चीता) को बचाने के लिए किए जाने वाले प्रयास उसके पूरे परिवेश और वहां रहने वाले अन्य छोटे जीवों (जैसे कराकल, लोमड़ी, और सियार) को स्वतः ही सुरक्षा कवच प्रदान कर देते हैं।

हालांकि, कूनो प्रबंधन के सामने अब एक नई चुनौती भी होगी। चीता, तेंदुआ और अब कराकल जैसे विभिन्न स्तर के शिकारियों के बीच कूनो के सीमित दायरे में सह-अस्तित्व (Co-existence) को संतुलित बनाए रखना आगामी समय में पार्क प्रशासन की रणनीतिक कुशलता की असली परीक्षा होगी।

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